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अस्सी बीस के इस दौर में रायबरेली सदर प्रत्याशी डॉक्टर मनीष चौहान के इस संदेश को समझिए

राय अभिषेक

क़ौमी रिपोर्टर: रायबरेली सदर सीट से कांग्रेस प्रत्याशी की एक फ़ोटो वायरल हुई है। इसमे वह कांग्रेस नगर अध्यक्ष समेत अन्य के साथ मज़ार पर दुआ मांग रहे हैं। विपक्षियों ने यह तस्वीर वायरल कर दी। हालांकि यह पूरा सच नहीं है। सभी धर्मों को सम्मान देने वाले डॉक्टर मनीष चौहान हिन्दू आस्था से जुड़े स्थानों पर भी माथा टेकते हैं। लेकिन यह तस्वीरें जानबूझकर दरकिनार कर दी गईं क्योंकि यह उन्हें सूट नहीं करती। दरअसल सभी धर्म से जुड़े आस्था के स्थान पर जाना एक बड़े संदेश का सम्प्रेषण भी करता है।

राजनीति में कब कौन सा सिक्का चल जाये कहा नहीं जा सकता। एक दौर था जब लोकसभा चुनाव में जामा मस्जिद के इमाम का समर्थन और अजमेर शरीफ दरगाह पर चादरपोशी की तस्वीरों का आना आम बात थी। विधानसभा चुनाव में भी दरगाहों और खानकाहों के साथ दाढ़ी टोपी वालों के साथ मंच साझा करने में पार्टियां होड़ करती थीं। दो हज़ार चौदह के बाद मुस्लिम वोट बैंक का तिलिस्म टूट गया। दो हज़ार उन्नीस आते आते भाजपा के साथ ही मुसलमानों की सबसे हितैषी पार्टी समाजवादी पार्टी भी सार्वजनिक मंचों पर इनसे किनारा करने लगीं। पिछले विधानसभा चुनाव में पूरे प्रदेश में भाजपा ने मुसलमानों को एक भी टिकट न देकर बड़ी लकीर खींच दी। संदेश साफ था,जातियों में बंटा चुनाव धर्म में तब्दील हो गया है। इस बड़े बदलाव से सभी पार्टियां ठिठक गयीं।

अब मज़ारों पर जाना,इफ्तार पार्टियां करना,उन पार्टियों के बस में भी नहीं रहा जो अल्पसंख्यकों के लिए उर्दू का शब्द अकलियत इस्तेमाल कर इसे मुसलमानों तक महदूद रखती थीं। उधर भाजपा ने बड़ी चालाकी से मुसलमानों का कुछ भी बुरा करना तो दूर बल्कि उनके लिए ज़्यादा कल्याणकारी योजनाएं तो दीं लेकिन सार्वजनिक मंचों पर उन्हें जगह नहीं दी। संदेश साफ था कि बीस प्रतिशत में हिस्सेदारी करने से बेहतर है 80 प्रतिशत पर पूरा कब्ज़ा जमाया जाय। मुसलमानों की सबसे हितैषी पार्टी इस खेल में उलझ गई। 2017 और 2019 के चुनाव में यह खेल ऐसा चरम पर पहुंचा कि मुल्ला मुलायम कहे जाने वाले मुलायम सिंह के बेटे अखिलेश यादव को शिवालय और परशुराम की मूर्तियों के इर्द गिर्द रहना पड़ा। खुद को खुले मंच से यह कहना पड़ा कि वह भी हिन्दू हैं। यहां तक कि सार्वजनिक मंचों से दाढ़ी टोपी एलिमिनेट करने के साथ ही मज़ार और दरगाहों से दूरी बनानी पड़ी। लेकिन इस वार को कुंद किया जयंत चौधरी ने। वह दरगाहों और मज़ारों पर तो नहीं गए लेकिन हवन पूजन और शिवालय की तस्वीरों का भी सहारा नहीं लिया। और उन्होने इतनी हिम्मत दिखाई कि उनके मंचों पर जालीदार टोपी नज़र आने लगी। उधर पश्चिम में जाट मुस्लिम एक हो रहा था और इधर अस्सी बीस के बयान पर लीपा पोती जारी थी। हिन्दू नेता जयंत चौधरी के मंचों पर दाढ़ी टोपी वालों की मौजूदगी के बाद रायबरेली के हिन्दू प्रत्याशी डॉक्टर मनीष चौहान की यह तस्वीर चौंकाती है। लगभग दो दशक के बाद जयंत चौधरी के साथ रायबरेली के इस हिन्दू प्रत्याशी ने हिम्मत दिखाई है। हालांकि पश्चिम में किसान आंदोलन के बाद जाट मुस्लिम एकता पर पड़ी बर्फ पिघल चुकी है इसलिए जयंत चौधरी यह हिम्मत दिखा सके। वहीं मध्य उत्तर प्रदेश जहां आज भी जाति पर धर्म हावी है,वहां डॉक्टर मनीष चौहान की यह तस्वीर साम्प्रदायिक सौहार्द के लिए बड़ा संदेश है।

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