लखनऊ,क़ौमी रिपोर्टर (विरासत डेस्क)। यूपी की राजधानी लखनऊ से 20 किमी दूर स्थित है बख़्शी का तालाब। एक जमाने में यह जगह गुमनाम थी। बस, कुछ गांवों का समूह था। वहीं, इटौंजा, महोना और कुम्हरावां का नाम जाना-पहचाना था।तब महोना नाम से परगना और विधानसभा भी थी। लेकिन, 1236 हिजरी के पहले बख़्शी का तालाब नाम की कोई जगह नहीं थी।

आज बख़्शी का तालाब के नाम से विधानसभा क्षेत्र, तहसील, विकास खण्ड, नगर पंचायत, रेलवे स्टेशन, पुलिस थाना, डाकखाना, बस स्टॉप, एयरफोर्स स्टेशन, सरकारी अस्पताल व डिग्री कॉलेज आदि के अलावा अन्य तमाम सरकारी, अर्धसरकारी व निजी संस्थान कायम हैं।दरअसल, इस गुमनाम जगह का नाम बख़्शी का तालाब तब से पड़ा, जब से अवध सल्तनत के वज़ीर त्रिपुर चंद बख़्शी सुपुत्र मजलिस राय बख़्शी निवासी कन्नौज ने यहां एक विशाल भव्य पक्का तालाब बनवाया था।

त्रिपुर चंद बख़्शी ने 1226 हिजरी में इस ऐतिहासिक तालाब, बारादरी, बाँके बिहारी मंदिर व शिव मंदिर की नींव डाली थी। इस पूरे निर्माण में 10 वर्ष का समय लगा था। तालाब के चारों तरफ विशालकाय बागें भी लगवाई थीं। इसके बाद 1236 हिजरी से इस गुमनाम स्थान को बक्सीताल (बख़्शी का तालाब) कहा जाने लगा।

आज बख़्शी का तालाब (बीकेटी) भारत में ही नहीं, बल्कि विश्व के अनेक देशों में जाना-पहचाना जाता है। क्योंकि, यह यूपी का ‘नॉलेज हब’ बन चुका है।
यहाँ शिक्षण, प्रशिक्षण के लिए कई दर्जन सरकारी एवं निजी संस्थान हैं। इसके अलावा यहां से निकले राजनेता, अधिकारी, इंजीनियर, डॉक्टर, समाजसेवी, कवि, लेखक, पत्रकार व अन्य मेधावी बख़्शी का तालाब का नाम विश्व पटल पर रोशन कर रहे हैं।
बकलम
नागेन्द्र बहादुर सिंह चौहान
स्वतन्त्र पत्रकार/समाजसेवी
रामपुर देवरई, बख़्शी का तालाब, लखनऊ-226201 (उप्र)
