क़ौमी रिपोर्टर:आज़ादी के बाद पाकिस्तान/बांग्लादेश से आए पंजाबी, बंगाली और कश्मीरी हिंदू और सिखों का साम्प्रदायिक होना समझ में आता है। उन्होंने घर, परिवार, कारोबार और अपने पुरखों के गांव/महल्ले/घर में घुसने के अधिकार खो दिए। यही इधर से उजड़ कर उधर गए मुसलमानों के लिए भी कहा जा सकता है।
मगर इधर के हिंदू या इधर रह गए मुसलमान में ज़हर की वजहें समझ नहीं आतीं। इधर के मुसलमान ने तो मान लो कुछ रिश्तेदार, ज़मीन या अधिकार खो भी दिए, हिंदू ने कथित बंटवारे में क्या खोया?
लेकिन बतौर मुल्क, भारत ने पिछले 100 साल में शांति से रहने का अधिकार खोया है। देश के आधे से ज़्यादा संसाधन एक दूसरे से निपटने में खप गए और जो बच गए उनपर नई ईस्ट इंडिया कंपनी क़ाबिज़ हो गईं। आज़ादी के बाद जो लोग मिल जुलकर यूरोप से आगे जा सकते थे वो मुल्क को धकेल कर अफ्रीका से भी पीछे ले गए। बावजूद इसके, इधर रह गए मुसलमान और इधर वाले हिंदुओं ने पिछले सत्तर साल में कोई सबक़ नहीं सीखा।
पाकिस्तान बनने के कारण और उसके बाद आई विपदा से हमारी पीढ़ी अंजान है। हमें उस त्रासदी से सबक़ सीखने चाहिए थे। अपने बच्चों को बताना चाहिए था कि घोर साम्प्रदायिकता का अंत कितना विनाशकारी है। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। 2021 में हम वहीं आकर खड़े हो गए हैं जहां 1921 में थे। हम उतने ही ज़हरीले और उतने ही मानव विरोधी राजनीतिक मशीन के पुर्ज़े हैं जितने सौ साल पहले हमारे पुर्खे थे… नतीजों से अंजान मूर्खों के झुंड।
@सीनियर जर्नलिस्ट जैग़म मुर्तज़ा की वाल से
