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मां और बाप की अज़्मतों को अशआर में पिरोने वाले रज़ा सिरसिवि नहीं रहे,मंगल के रोज़ सिरसी के आबाई कब्रिस्तान में हुई तदफीन

                              सैय्यद हुसैन अख्तर
                      qaumireporter@gmail.com

क़ौमी रिपोर्टर: मां और बाप की अज़्मतों को अशआर में पिरोने वाले शायर रज़ा सिरसिवि नहीं रहे।कभी उनकी नज़्मों पर नम हो जाने वाली आंखों से पीर के रोज़ अश्क का दरिया फूट पड़ा है।इरान,इराक़,साऊथ अफ्रीका,पाकिस्तान और सीरिया जैसे मुल्कों में अपने अशआर का जादू बिखेर चुके रज़ा सिरसिवि शेरो शायरी की दुनिया के कई अवार्ड भी हासिल कर चुके है।दुनिया के कई मुल्कों में अपनी शेरो शायरी के जौहर दिखाने वाला यह अज़ीम शायर खुद कई ग़मों का समंदर समेटे जी रहा था।शेरो शायरी को ही ज़रियै माश बना कर पूरी ज़िंदगी इसी फन के नाम वख्फ़ कर देने वाले शायर रज़ा सिरसिवि की अहलिया तवील अरसे क़ब्ल इस दुनिया से कूच कर गईं थीं।घर में फ़क़त एक बेटा जो फिजिकली चैलेंज्ड है और एक ही बेटी जिसकी शादी अभी नहीं हुई है। इन हालात में एक बाप पर क्या गुज़रती है यह साफ नज़र आता है, बाप पर लिखी गई उनकी नज़्म के चंद ही अशआर में।

दिन ढले जब करके मजदूरी रज़ा आता है बाप
देख कर हंसते हुए बच्चों को सुख पाता है बाप
जाने कितने ख्वाब करते हैं सफ़र बच्चों के साथ
घर से पहली बार जब स्कूल ले जाता है बाप
रज़ा सिरसिवि के मोबाइल नंबर पर उनके भतीजे शरफ़ मुर्सलीन जाफरी ने बताया कि वह यूं तो लंबे अरसे से बीमार थे लेकिन पीर के रोज़ अचानक हार्ट अटैक हुआ और उनकी मौत घर पर ही हो गई।शरफ़ के मुताबिक उनका 34 साल का बेटा है जो आसानी से चल फिर नहीं सकता और न ही साफ बोल सकता है।एक बेटी है जिसकी शादी अभी नहीं हुई है और रज़ा साहब की अहलिया काफ़ी पहले तब इन्तेक़ाल कर गईं जब बच्चे छोटे ही थे।मुमकिन है कि रज़ा सिरसिवि ने अपनी अहलिया की,एक मां के तौर पर उन तकलीफों को महसूस किया हो जो उनके मां के उनवान से लिखी गई नज़्म में साफ नज़र आती है।यहाँ पेश हैं उसी नज़्म के चंद अशआर।
मौत की आग़ोश में जब थक के सो जाती है मां
तब कहीं जाकर रज़ा थोड़ा सुकूँ पाती है मां
फिक्र में बच्चों की कुछ इस तरह घुल जाती है मां
नौजवां होते हुए बूढ़ी नज़र आती है मां
रज़ा सिरसिवि के भतीजे शरफ़ बताते हैं कि सेल्स टैक्स कमिश्नर जावेद आब्दी हों या फ़िल्मी दुनिया की मशहूर हस्ती जावेद जाफरी,सब ने उनकी मौत की खबर सुनते ही किये गए फोन पर जो ग़म का इज़हार किया उससे लगता है कि यक़ीनन लफ़्ज़ों का एक मुसव्विर चला गया जिसकी दुनिया को ज़रूरत थी।रज़ा सिरसिवि मंगल के रोज़ भले अपने अबाई कब्रिस्तान दादे शाह अली में सुपुर्दे ख़ाक हो गए हों लेकिन अपने पीछे मौत का जो फ़लसफ़ा छोड़ गए वह रहती दुनिया तक हर बशर को मौत का हौसला देने वाला साबित होगा।
ज़िंदगी ने लिबास छीन लिया
मौत ने कम से कम कफ़न तो दिया
ज़िंदगी दर बदर फिराती रही
मौत ने मुस्तकिल वतन तो दिया
ज़िंदगी जिसको ढूंढती ही रही
मौत ने वो सुकूँ नसीब किया
ज़िंदगी भर जो दूर दूर रहे
मौत ने उनको भी करीब किया

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