धर्म

क्यों मनाते हैं मोहर्रम, क्या है मजलिस, ताज़िया और अलम

क़ौमी रिपोर्टर: मोहम्मद साहब के नवासे इमाम हुसैन की याद में मनाए जाने वाले मोहर्रम की तैयारियां अंतिम दौर में हैं। चंद्रदर्शन के अनुसार 10 या 11 अगस्त से मोहर्रम शुरू होगा। शिया मुसलमान मोहर्रम शुरू होने के 10 दिन तक शोकसभाएँ करते हैं, जिसे मजलिस करते हैं। साथ ही अलम और ताज़िया का जुलूस भी निकालते हैं।

इस वर्ष कोरोना गाइडलाइन के अनुसार जुलूस नहीं उठेंगे, लेकिन सीमित संख्या में इमामबारगाहों में मजलिस आयोजित होगी। इसी के तहत रायबरेली में इमाम्बरगाहों की साफ सफाई और रंगाई पुताई का काम अंतिम दौर में है। शिया मुसलमानों का कहना है कि पिछले वर्ष की भांति इस साल भी सरकार की गाइडलाइन का पूरा पालन होगा। रायबरेली अज़ा कमेटी के सचिव वसी अज़हर नकवी ने बताया कि ज़ैनबिया इमामबारगाह में कोरोना गाइडलाइन का पालन करते हुए सीमित संख्या में लोग अज़ादारी के लिए जुटेंगे।

क्या है मोहर्रम
मोहर्रम इस्लामी कैलेंडर के पहले महीने का नाम है। इसी माह में 14 सौ साल पहले इराक के कर्बला में मुहम्मद साहब के नवासे इमाम हुसैन अपने बहत्तर साथियों समेत यज़ीद नाम के तत्कालीन शासक की सेना के हाथों कत्ल कर दिए गए थे। इमाम हुसैन की याद में ही पूरी दुनिया सहित भारत में भी इस माह की पहली तारीख से शोक मनाया जाता है।

यह है मोहर्रम का इतिहास
रायबरेली के मौलाना सैय्यद मोहम्मद मोहसिन रिज़वी बताते हैं कि 14 सौ साल पहले अरब में यज़ीद नाम का शासक इमाम हुसैन से बैयत (शासक होने की स्वीकृति) चाहता था। इमाम हुसैन ने बैयत से इनकार कर दिया था। बैयत से इनकार करने पर उनके पैतृक निवास मदीना पर यज़ीदी शासन द्वारा उन्हें परेशान किया जाने लगा।

जिसकी वजह से वह कूफ़ा की ओर चल दिये, जहां उनके अनुयायी रहते थे। लेकिन कूफ़ा से पहले ही कर्बला के मैदान में उन्हें यज़ीद की सेना ने रोक लिया। मोहर्रम माह की 10 तारीख को इमाम हुसैन समेत 72 साथियों को कत्ल कर दिया गया था। बाद में इमाम हुसैन के परिवार की महिलाओं और बच्चों को तत्कालीन राजधानी शाम जिसे आज सीरिया कहते हैं, वहां कैद कर दिया गया था।

एक साल बाद यज़ीद ने जब इन लोगों को आज़ाद किया तब महिलाओं ने अपने अनुयायियों को सारी जानकारी दी, और तब से ही मोहर्रम माह में शोक मनाए जाने की परंपरा शुरू हुई है।

क्या है ताज़िया अलम और मजलिस
मौलाना रिज़वी बताते हैं वाक़ये कर्बला के बाद शुरुआती दौर में मजलिसों का आयोजन होता था। मजलिस वैसे ही होती है जैसे हिन्दू भाई सत्संग करते हैं। इन मजलिसों के माध्यम से मोहम्मद साहब के परिवार वालों की शिक्षाएं बताई जाती हैं और मोहर्रम माह में कर्बला के मैदान में इमाम हुसैन पर हुए ज़ुल्म का बयान होता है।

बाद में भारत के मुसलमान ताजिया का जुलूस निकालने लगे। मौलाना रिज़वी के मुताबिक मुस्लिम शासक तैमूर लंग मोहर्रम माह में हर वर्ष इराक स्थित इमाम हुसैन के रौज़े पर जाता था। एक वर्ष तबियत खराब होने की वजह से वह नहीं जा पाया, इसलिए उसने इमाम हुसैन के रौज़े की आकृति कागज़ और बांस की तीलियों से बनवाया जिसे ताज़िया नाम दिया गया।

भारत में तब से ही ताज़िया की परंपरा शुरू हुई, जिसे कई लोग उठा कर जुलूस की शक्ल में ले जाते हैं। अलम उस झंडे या परचम को कहते हैं जो इमाम हुसैन के लश्कर की अगुवाई करने वाले के हाथों में हुआ करता था। इस अलम को ही लोग दूर से ही देखकर पहचान लेते थे कि इमाम हुसैन का लश्कर आ रहा है।

आज भी शिया मुसलमान जब मोहर्रम में जुलूस निकालते हैं तो उनके हाथों में लंबे से बांस पर ऊपर की ओर पंजा लगा हुआ अलम होता है जिसे कपड़े से लपेट कर उसे करीने से पटका लगाकर सजाया जाता है।

कोरोना काल में कैसे मनाया जाएगा मोहर्रम
बीते वर्ष कोविड-19 की विभीषिका आ चुकी थी। सरकार ने गाइडलाइन जारी की थी जिसके अनुसार एक जगह पर भीड़ एकत्र करने की मनाही थी। इसी का पालन करते हुए पिछले साल मोहर्रम माह में सार्वजनिक कार्यक्रम आयोजित नहीं किए गए। इस वर्ष भी कोरोना के चलते उत्तर प्रदेश सरकार ने जो गाइडलाइन जारी की है उसका अक्षरशः पालन किया जाएगा। मौलाना रिज़वी कहते हैं कि मोहम्मद साहब की हदीस है, वतन से मोहब्बत इबादत है।मौजूदा वक्त में हमारा वतन हिन्दोस्तान है लेहाज़ा हम अपनी मोहब्बत का इज़हार करते हुए देश और देशवासियों को कोई परेशानी न हो इसलिए सरकारी गाइडलाइन का पूरा पालन करते हुए जुलूसों का आयोजन नहीं करेंगे।

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