ऑफ़ बीट

कब्रस्तान में तब्दील होते फेसबुक अकाउंट के बीच अभी भी नफरत के बोल ज़िंदा हैं

सैय्यद हुसैन अख्तर,चीफ एडिटर, क़ौमी रिपोर्टर:पिछले दो तीन हफ्तों से शायद ही कोई दिन ऐसा हो जब सुबह उठकर फेसबुक एकाउंट एक्सेस करने पर किसी अपने या किसी अपने के अपने की मौत का समाचार न हो। कल तक फेसबुक पर हौसला बंधाते कई ऐसे दोस्तों की अचानक किसी सुबह मरने की खबर आ जाती है।
मरने वाले कि उम्र भी अब मायने नहीं रख रही है। पचास से नीचे या ऊपर का भी कोई क्राइटेरिया नहीं।बस अचानक ही एकाउंट खोलते ही सीधे मौत की खबर।पेज स्क्रॉल करते हुए दर्जनों ऐसे एकाउंट मिलेंगे जो कुछ दिन पहले तक फेसबुक पर खूब ऐक्टिव रहते थे लेकिन अब उनकी फेसबुक वॉल सूनी है।देखते ही देखते फेसबुक एकाउंट कब्रिस्तान में तब्दील हो गए हैं।यह हाल तकरीबन हर फेसबुक एकाउंट होल्डर का है।
प्रयागराज के रहने वाले जर्नलिस्ट शोएब रिज़वी कहते हैं,मैंने मोबाइल पर एफबी ऐप के माध्यम से अपना एकाउंट एक्सेस कर रखा है।सुबह उठने पर दर्जनों नोटिफिकेशन होते हैं जिन्हें खोलने पर कई अच्छे संदेश,दोस्तों की गुड मॉर्निंग और अपनों के जन्मदिन व एनिवर्सरी के मैसेज हुआ करते थे जिन्हें देखने के बाद पूरा दिन बेहतर गुज़र जाया करता था। लेकिन इधर कुछ दिनों से फेसबुक पर हर दिन किसी अपने की मौत का समाचार मन को खिन्न कर दे रहा है।अब तो स्थिति यह है कि सुबह उठकर नोटिफिकेशन क्लिक करने से पहले ऊपर वाले से दुआ करनी पड़ती है कि आज कोई दुखद न्यूज़ न हो।
रिज़वी कहते हैं ऐसा भी नहीं हो सकता कि फिलहाल फेसबुक एक्सेस करना छोड़ दें क्योंकि पत्रकार होने के नाते खुद को अपडेट रखने के लिये फेसबुक आज मजबूरी बन गई है।नोएडा की रहने वाली मनदीप कौर कहती हैं।मेरे दो भाई एक छोटा बिहार में कारोबार करता था और बड़े भाई की राजस्थान में आढ़त है।
दोनों इस कोरोना काल में अलग अलग समय पर काल के गाल में समा गए।दोनों के एकाउंट ऐक्टिव हैं।कभी कभी उनसे जुड़ी कुछ यादें भी भतीजे पोस्ट कर देते हैं।उनके नाम से नोटिफिकेशन आता है तो एक पल के लिए ही सही लेकिन थोड़ा सुकून मिलता है।फेसबुक पर पहले से ही ऐसे मुर्दा लोगों के लाखों एकाउंट हैं लेकिन इस कोरोना काल मे इसकी तादाद तेज़ी से बढ़ी है।
खास बात यह कि हर रोज़ फेसबुक पर जब किसी अपने की तबियत खराब होने या मरने की खबर आ रही तब भी नफरती पोस्ट का आना रुका नहीं। ऐसी पोस्ट कम तो हुई हैं लेकिन अभी भी इक्का दुक्का पोस्ट नज़र आती हैं।दो दिन पहले प्रयागराज के एक छोटे भाजपा नेता की ऐसी ही पोस्ट नज़र आई।
दुनिया की सब से बड़ी पार्टी के अदना ही सही लेकिन नेता होने के नाते जब लोगों की मदद के लिए आगे आना चाहिए तब वह पोस्ट करते हैं कि सैफई में नचनिया का नाच देखने और हज हाउज़ बनवाने वालों ने हॉस्पिटल क्यों नहीं बनवाया था। हालांकि पोस्ट से उनके ज्ञान का स्तर भी सामने आता है क्योंकि सैफई मेडिकल कालेज से लेकर झांसी में बुंदेलखंड के सबसे बड़े पैरा मेडिकल इंस्टिट्यूट समेत प्रदेश के दर्जनों पीएचसी सीएचसी सपा शासन काल में ही बनी हैं।
कई सीएचसी पर आज भी तब के स्वास्थ्य मंत्री अहमद हसन के नाम की शिलापट्ट अंकित है। लेकिन राजनीति में झूठे-सच्चे आरोप लगाए जाने की परंपरा है और इसे अन एथिकल भी नहीं माना जाता। हालांकि पेंडमिक के इस दौर में जब फ़ेसबुक एकाउंट कब्रिस्तान बनते जा रहे हों,ऐसी पोस्ट थोड़ा विचलित करती है।

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