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इसलिए रायबरेली का मुंशीगंज स्मारक कहलाता है दूसरा जलियांवाला बाग़

दिलीप चौधरी

क़ौमी रिपोर्टर:पंजाब(punjab)के जलियांवाला में क्या हुआ था सब जानते हैं। ठीक ऐसा ही सौ साल पहले रायबरेली के मुंशीगंज में सई नदी(sai river) के तट पर हुआ था। हज़ारों की तादाद में इकट्ठा हुए किसानों(farmers) पर अन्धाधुन्ध फायरिंग (firing) की गई।

जलियाँवाला बाग़ की तरह चारों ओर से घिर गए थे किसान

एक तरफ से नदी और तीन तरफ से अंग्रेज़ी हुकूमत की सेना से घिरे किसान। इस हुजूम पर हुई फायरिंग में सात सौ से ज़्यादा किसान मौत की नींद सो गए।इसी लिए इस कांड को दूसरे जलियांवाला बाग(jaliyanvala kand)कांड कहते है।दूसरा जलियांवाला बाग़ कांड कहे जाने वाले मुंशीगंज कांड की आज पुण्यतिथि है ।इसे हर वर्ष बलिदान दिवस के तौर पर मनाया जाता है। रायबरेली की सीमा पर स्थित मुंशीगंज में आज ही के दिन 7 जनवरी 1921 को तकरीबन साढ़े सात सौ किसानों को गोलियों से भून दिया गया था।

किसानों के खून से लाल हो गया था सई नदी का जल

मुंशीगंज और रायबरेली के बीच बहने वाली सई नदी किसानों के खून से लाल हो गई थी।तब देश में अंग्रेजों का शासन (british regime) था। किसान ज़मींदारों (landlords) के अत्याचार से त्राहिमाम कर रहे थे।उसी समय प्रतापगढ़(pratapgarh) के बाबा राम चन्दर ने बेगार लिए जाने,बेपनाह लगान आदि वसूलने के विरोध में आंदोलन चलाया।इस आंदोलन को लेकर मुखर रहे बाबा जानकी दास और अमोल शर्मा को तत्कालीन ज़िलाधीश ए जी शौरिफ ने गिरफ्तार करवा लिया।गिरफ्तार कर उन्हें लखनऊ जेल(lucknow jail) के लिए रवाना कर दिया।

इस अफवाह से उग्र हो गए थे किसान

दोनो किसान नेताओं की गिरफ्तारी के बाद अफवाह फैली कि उनकी हत्या कर दी गई है। यह अफवाह फैलते ही प्रतापगढ़ और रायबरेली के गांव गांव से किसानों का जत्था सई नदी के तट पर इकठ्ठा होने लगा।हज़ारों किसानों का यह जत्था किसी भी समय सई नदी पार कर ज़िला मुख्यालय को कब्ज़े में ले सकता था।अंग्रेजी शासन ने खतरे को भांप कर सेना बुला ली।सेना ने किसानों को तीन तरफ से घेर लिया और एक तरफ नदी थी।इसी बीच किसानों की सूचना पर पंडित जवाहर लाल नेहरू (pandit jawahar lal nehru) भी रायबरेली पहुंच गए लेकिन उन्हें घटना स्थल से तकरीबन 3 किलोमीटर पहले कलेक्ट्री कचहरी के पास रोक लिया गया।

इस लिए अंग्रेजों ने चलवा दी गोली

शांतिपूर्ण प्रदर्शन किसानों को और ज़्यादा परेशान कर रहा था।किसी बड़े खतरे को भांप कर अंग्रेज़ अफसर ने सेना को गोली चलाने का हुक्म दे दिया।तीन तरफ से वर्षा की बूंदों जैसी गोली की बौछार से सैकड़ों किसान धराशायी हो गए।कुछ के शव नदी में बह गए और कुछ के शवों को अंग्रेजों ने बैलगाड़ी पर  लाद कर दूर दराज़ पहुंचा दिया।इन्ही शहीद किसानों की याद में हर वर्ष यहां बलिदान दिवस मनाया जाता है।क्योंकि किसानों को घेरकर मारा गया था इसलिए इस घटना को दूसरा जलियांवाला बाग़ कांड कहा जाता है।

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