कौशाम्बी,सैय्यद मोहम्मद यासीन, क़ौमी रिपोर्टर:मुकद्दस महीने रमजानुल मुबारक के रोजे का इस्लाम धर्म में जहां अलग ही महत्व है वहीं रोजा रखने के लिए नियत का होना भी शर्त है। अगर कोई व्यक्ति बिना नियत के पूरा दिन बिना कुछ खाये पिये गुजार दे तो वह रोजा नहीं कहलाएगा। हर इबादत की सेहत के लिए नियत का होना शर्त है।
हाफिज मोहम्मद खालिद ने मिशकात शरीफ (इस्लामी किताब) की पहली हदीस का हवाला देते हुए बताया कि हर काम नियम पर फैज होता है। इसलिए पाक माह रमजान के रोजे रखने के लिए भी नियत का होना बेहद जरूरी है। अलबत्ता नियत के अलफाज जुबान से कहना जरुरी नहीं है बल्कि सहरी में उठना और सहरी खाना भी नियत में शुमार है। हां अगर जुबान से नियत कर लिया जाए तो बेहतर है।
रमजान के महीने में रोजाना रोजे में नियत करना जरुरी है। एक दिन नियत कर लेना सभी रोजों के लिए काफी नहीं है। रमजानुल मुबारक के रोजे में इतनी नियत कर लेना काफी है कि आज मेरा रोजा है।रमजान के पाक महीने में कोरोना के कारण मस्जिदें ज्यादातर खाली पड़ी हैं। आम दिनों में रमजान के समय रोजेदारों का हुजूम उमड़ पड़ता था।
इस महीने में अल्लाह की तरफ से मिलने वाली नेमतों और रमजान की अहमियत बेमिसाल है। रोजेदारों का पूरा दिन घर में अकीदत और इबादत के बीच गुजर रहा है। लोग नमाज और तेलावत में लगे रहते हैं। युवाओं के अलावा बुजुर्गों व बच्चे भी इबादत में शिरकत कर रहे हैं।
