विश्व सोरायसिस दिवस पर त्वचा रोग विशेषज्ञ डॉ. सोनाली सक्सेना की सलाह, बीमारी को लेकर भ्रांतियों से बचें और समय पर कराएं उपचार
लखनऊ, 28 अक्टूबर। त्वचा पर लाल चकत्ते, मोटी परतें और सफेद या चांदी जैसी पपड़ी दिखाई देने पर इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। यह सोरायसिस के लक्षण हो सकते हैं। समय पर पहचान, विशेषज्ञ की सलाह और नियमित उपचार से इस बीमारी के लक्षणों को नियंत्रित करने के साथ ही मरीज के जीवन की गुणवत्ता में सुधार किया जा सकता है। यह जानकारी त्वचा रोग विशेषज्ञ डॉ. सोनाली सक्सेना ने विश्व सोरायसिस दिवस के अवसर पर दी।
प्रत्येक वर्ष 29 अक्टूबर को विश्व सोरायसिस दिवस मनाया जाता है। इसका उद्देश्य सोरायसिस के प्रति जागरूकता बढ़ाना, बीमारी से जुड़ी भ्रांतियों को दूर करना और पीड़ित लोगों को समय पर निदान एवं उचित उपचार के लिए प्रेरित करना है।
क्या है सोरायसिस और कैसे पहचानें इसके लक्षण?
डॉ. सोनाली सक्सेना के अनुसार, सोरायसिस एक दीर्घकालिक सूजन संबंधी त्वचा रोग है, जो शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली से जुड़ा होता है। इस बीमारी में त्वचा की कोशिकाएं सामान्य से अधिक तेजी से बनने लगती हैं। इसके कारण त्वचा पर लालिमा, मोटी परतें और सफेद या चांदी जैसी पपड़ी दिखाई दे सकती है।
इससे पीड़ित लोगों को खुजली, जलन, त्वचा में दरार और कभी-कभी दर्द की समस्या भी हो सकती है। इसके लक्षण आमतौर पर कोहनी, घुटनों, सिर की त्वचा और कमर के आसपास दिखाई देते हैं। कुछ मरीजों में हथेलियों, तलवों और नाखूनों पर भी इसका असर पड़ सकता है। कुछ मामलों में सोरायसिस जोड़ों को भी प्रभावित करता है, जिससे दर्द और अकड़न की समस्या हो सकती है।
छूने से नहीं फैलता सोरायसिस
सोरायसिस को लेकर समाज में कई तरह की भ्रांतियां प्रचलित हैं। इनमें सबसे आम धारणा यह है कि यह बीमारी मरीज के संपर्क में आने से दूसरे व्यक्ति को हो सकती है। जबकि वास्तविकता यह है कि सोरायसिस संक्रामक बीमारी नहीं है।
डॉ. सक्सेना के अनुसार, हाथ मिलाने, साथ बैठने, भोजन साझा करने या मरीज के संपर्क में आने से सोरायसिस नहीं फैलता। इसलिए इस बीमारी से पीड़ित लोगों के साथ किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए। त्वचा पर दिखाई देने वाले निशानों के आधार पर किसी व्यक्ति की स्वच्छता या जीवनशैली के बारे में गलत धारणा बनाना भी उचित नहीं है।
तनाव और कुछ अन्य कारक बढ़ा सकते हैं परेशानी
सोरायसिस होने के पीछे आनुवंशिक प्रवृत्ति और प्रतिरक्षा प्रणाली की भूमिका होती है। तनाव, त्वचा पर चोट, कुछ संक्रमण, धूम्रपान, अत्यधिक शराब का सेवन और कुछ दवाएं इसके लक्षणों को बढ़ा सकती हैं। हालांकि, बीमारी को बढ़ाने वाले कारक हर मरीज में अलग-अलग हो सकते हैं।
यह बीमारी किसी भी उम्र में हो सकती है। बच्चों, युवाओं और वयस्कों में इसके मामले सामने आते हैं। इसलिए त्वचा पर लगातार बने रहने वाले असामान्य चकत्तों या पपड़ी को नजरअंदाज करने के बजाय त्वचा रोग विशेषज्ञ से परामर्श लेना चाहिए।
आधुनिक उपचार से मिल सकती है राहत
सोरायसिस के उपचार का चयन बीमारी की गंभीरता, प्रभावित हिस्सों, मरीज की उम्र, अन्य बीमारियों और पहले किए गए उपचार के परिणामों के आधार पर किया जाता है। आधुनिक चिकित्सा में विभिन्न प्रकार की दवाएं उपलब्ध हैं। कुछ मरीजों में बायोलॉजिक दवाओं का भी इस्तेमाल किया जाता है।
विशेषज्ञ के अनुसार, हर मरीज का उपचार एक जैसा नहीं होता। किसी दूसरे व्यक्ति को लाभ पहुंचाने वाली दवा हर मरीज के लिए उपयुक्त हो, यह जरूरी नहीं है। इसलिए बिना चिकित्सकीय सलाह के दवाएं लेना, लंबे समय तक स्टेरॉइड युक्त क्रीम का इस्तेमाल करना या उपचार बीच में छोड़ देना नुकसानदायक हो सकता है।
जागरूकता और सामाजिक सहयोग भी जरूरी
विश्व सोरायसिस दिवस का संदेश है कि बीमारी के प्रति सही जानकारी फैलाने के साथ ही इससे पीड़ित लोगों को सम्मान और सहयोग दिया जाए। समय पर पहचान, विशेषज्ञ की सलाह, नियमित उपचार और जीवनशैली से जुड़े उचित बदलावों से सोरायसिस को बेहतर तरीके से नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है।
डॉ. सोनाली सक्सेना
त्वचा रोग विशेषज्ञ, लखनऊ
डिस्क्लेमर: यह लेख स्वास्थ्य संबंधी सामान्य जागरूकता के उद्देश्य से प्रकाशित किया गया है। सोरायसिस के लक्षण होने पर त्वचा रोग विशेषज्ञ से परामर्श लें।
