धर्म

सुब्हानी मियां की सरपरस्ती में दरगाह आला हजरत पर मनाया गया यौम-ए-रज़ा,1912 में अंग्रेजों के खिलाफ दिया था आला हज़रत ने फतवा : मुफ्ती सलीम नूरी

बरेली, जीतेंद्र वर्मा, क़ौमी रिपोर्टर:आज दरगाह आला हज़रत पर दरगाह प्रमुख हज़रत मौलाना सुब्हान रज़ा खान (सुब्हानी मियां) की सरपरस्ती व सज्जादानशीन मुफ्ती अहसन रज़ा क़ादरी (अहसन मियां) की सदारत और टीटीएस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष सय्यद आसिफ मियां की देखरेख में आला हज़रत फ़ाज़िले बरेलवी का 170 वा यौम-ए-पैदाइश (जन्मदिन) का जश्न सादगी के साथ मनाया गया। प्रोग्राम दरगाह शरीफ के अन्दर कोविड 19 की गाइड लाइन का पालन करते हुए चंद उलेमा की मौजूदगी में हुआ।

प्रोग्राम को सारी दुनिया के अकीदतमंदों ने घर बैठे ऑनलाइन सुना। महफ़िल का आगाज़ कारी रिज़वान रज़ा ने तिलावत ए कुरान से किया। नातख़्वा हाजी गुलाम सुब्हानी व आसिम नूरी ने नात-ओ-मनकबत का नज़राना पेश किया।

दरगाह के मीडिया प्रभारी नासिर कुरैशी ने बताया कि महफ़िल का आगाज़ सुबह 9 बजे किया गया। इस मौके पर महफ़िल को ख़ुसूसी खिताब करते हुए मुफ्ती सलीम नूरी बरेलवी ने आला हज़रत को खिराज़ पेश करते हुए कहा कि आला हज़रत ने मज़हब व मसलक की खिदमात के साथ मुल्क-ए-हिंदुस्तान को आज़ाद कराने में अहम रोल अदा करते हुए 1912 में अंग्रेजों के खिलाफ फतवा दिया। जिसमे आपने अंग्रेजों के जजों को जज, हाकिमों को हाकिम, अंग्रेजों की कचहरी को कचहरी, उनके बनाये कानून को मानने से साफ इंकार कर दिया।

मुसलमानों से कहा कि अंग्रेजों द्धारा स्थापित कोर्ट कचहरी में अपना पैसा हरगिज़ खर्च न करें। आला हज़रत का अंग्रेजों के खिलाफ नफ़रत का ये आलम था कि आप जब भी डाक टिकट का इस्तेमाल करते तब डाक टिकट पर मलका विकटोरिया के फोटो को हमेशा उल्टा लगाते थे। आगे कहा का आला हज़रत 1856 ई0 में इस दुनिया मे तशरीफ़ लाए तब हमारा देश मुश्किल दौर से गुजर रहा था। आपकी पैदाइश के एक साल बाद यानि 1857 में आज़ादी का बिगुल फूंक दिया गया। उस वक़्त अंग्रेजों के खिलाफ आवाज़ उठाने वाले मुस्लिम स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, उलेमा, दानिशवरों की लीडरशिप को खत्म कर दिया गया था।

अज़ीम मुजाहिद फिरंगीमहली, खैराबादी, रूहानी खानकाहों, दारुल इफ्ता के वजूद खत्म कर दिए गए। ऐसे वक़्त में आला हज़रत ने इश्के रसूल की बुनियाद पर इल्म की शमा रौशन करते हुए न केवल दीन के नुकसान की भरपाई करने की कोशिश की बल्कि मुल्क की खिदमत करने में अहम रोल अदा किया। साथ ही हिदुस्तान ही नही बल्कि पूरे आलम की रहनुमाई फ़रमाई।

मौलाना डॉक्टर एजाज़ अंजुम ने भी आला हज़रत की मज़हबी व इल्मी खिदमात पर रोशनी डालते हुए कहा कि आज आपके इल्म का डंका हिंदुस्तान की ही सरज़मी पर नही बल्कि सारी दुनिया मे बज रहा है। फतावा रजविया, कंज़ुल ईमान, हिदायतें बख्शिश ही आपके इल्म का लोहा मनवाने के लिए काफी है। फातिहा कारी रिज़वान रज़ा व मौलाना अख़्तर ने शिज़रा मुफ्ती अय्यूब खान ने पढ़ा। मुल्क से कोरोना खात्मे व खुशहाली की ख़ुसूसी दुआ मुफ्ती अनवर अली ने पढ़ी। आईटी सेल प्रभारी मास्टर ज़ुबैर रज़ा ने प्रोग्राम का सारी दुनिया मे ऑनलाइन प्रसारण किया। हाजी इक़रार, शाहिद नूरी, ज़हीर खान, गौहर खान, साजिद नूरी व औररंगज़ेब खान ने सबको तबर्रूक तकसीम किया। आखिर में सलातो सलाम का नज़राना पेश किया गया।

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